शामी

जौनपुर  से  सात-आठ  किलोमीटर  दूर  हरजुपुर  था|  मेरे  मामा-नाना  का  वहाँ  घर  था|  मुझे  मामा  का  ही  ज़्यादा  साथ  मिलता  था|  नाना  बैलगाड़ी  चलाते  थे  सो  वे  अक्सर  घर  से  बाहर  रहते  थे|  वहाँ  लहराते  हरे-भरे  खेत  थे|  उनमें  लहराती  मटर  की  हरी-हरी  फलियाँ  मुझे  बहुत  प्यारी  थी|  गाँव  के  पास  ही  अमराई  थी  और  छोटी  सी  तलैया|  अमराई  में  गन्ना  पेरने  का  कोल्हू  था|  काफ़ी  पुराना|  उस  पर  कुछ  आकृतियाँ  बनी  थी|  शायद  लोक-कला  की  कुछ  डिज़ाइनें  भी|  मैं  तब  आठ-नौ  वर्ष  का  था| सुबह-शाम  मामी  के  हाथों  का  बना  भोजन  करने  के  बाद  पूरा  दिन  स्वच्छन्द  बीतता  था|  कोई  सम्व्यसक  साथी  मिल  गया  तो  ठीक  वरना  अकेला  ही कुलाँचे  भरता  रहता  था|

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वह  मटर  की  फलियाँ  एक  मौनी  में  तोड़ती  मिली  थी|  उम्र  होगी  यही  कोई  दस-ग्यारह  की| मैं  उसको  देखकर  अचकचा  गया  पर  वो  मुस्कुरा  दी|  सांवला  रंग,  बड़ी  बड़ी  आँखें|  वह  मुझे  गौर  से  देख  रही  थी|  मटर  की  फलियों  का  हरा  रंग|  जामुनी   केशों  पर  और  उसके  चेहरे  पर  भी  पड़ती  सुनहरी  धूप|  बड़ी  अच्छी  लगी  मुझे|’मटर  खाओगे?’

‘हाँ,  इसीलये  तो  आया  हूँ|’

‘दूसरे  के  खेत  से  मटर  खाओगे  तो  डाँट  खाने  का  डर  नहीं  है?’

मैं  सहज  भाव  से  बोला – ‘मैं  तो  गाँव  का  मेहमान  हूँ|  किसी  भी  खेत  से  खा  सकता  हूँ|  मुझे  कोई  मना  नहीं  करेगा|  तुम  भी  तो  फलियाँ  तोड़  रही  हो,  तुम्हें  डाँट  का  डर  नहीं  है ?’

वह  हँस  पड़ी|  दाँतों  की  उजली  चमक  ने  जैसे  उसकी  पूरी  देह  को  उजास  से  भर  दिया  हो|  ‘यह  मेरा  ही  खेत  है  लेकिन  तुम  तो  मेहमान  हो|  जब  चाहो  इसमें  से  फलियाँ  तोड़  कर  खा  सकते  हो|  क्या  नाम  है  तुम्हारा?’

‘गंगा,  और  तुम्हारा?’

‘श्यामा|  काली  हूँ  ना,  इसीसे  श्यामा  नाम  रख  दिया|  लोग  मुझे  शामी  बुलाते  हैं|’

‘मैं  भी  शामी  कहूँगा|  तुम  थोड़ी  काली  हो,  पर  सुंदर  हो|’

वह  एकटक  मुझे  देखती  रही|

फिर  हम  अक्सर  मिलते  रहे|  कभी  खेत  में,  कभी  गन्ना  पेरने  वाले  कोल्हू  के  पास|  वह  भरूके  में  गन्ने  का  रस  पीने  को  देती  या  गन्ने  के  दो  टुकड़े  लेकर,  मेरा  हाथ  पकड़कर  किसी  उँची  मेड  पर  बैठ  जाती| हम  गन्ना  दाँतों  से  छीलते|  कभी-कभी  वही  छीलकर  मेरी  तरफ  बढ़ा  देती|

‘यह  जूठा  नहीं  है?’

‘जूठा  क्यों?  तुम्हें  आम  खाने  को  दिया  था  ना ?  वो  तो  बड़े  मज़े  से  खा  लिया  था|  उसे  मैने  चख  कर  दिया  था|  मेहमान  को  खट्टे  आम  कैसे  खिलाती?’

मुझे  मामा  के  यहाँ  जाना  अब  और  भी  अच्छा  लगने  लगा  था|  वह  मेरी  प्रतीक्षा  करती|  मैं  पहुँचता  तो  खिल  उठती|  हमारा  पूरा  समय  लगभग  साथ  ही  बीतता  था|  कभी-कभी  मामी  की  परोसी  थाली  के  साथ  वह  भी  थाली  लगवा  लेती|  उसके  बारे  में  मामी  ने  ही  बताया  था  की  पड़ोस  में  रहती  है  और  उसके  परिवार  में  केवल  माँ  है|  थोड़े  से  खेत  में  गुजर  चल  जाता  है|  शामी  सबकी  चहेती  है|  तुम्हारे  साथ  हँस- बोल  लेती  है  नहीं  तो  इसकी  उम्र  की  लड़कियाँ  ग़रीब  होने  के  नाते  इसको  साथ  नहीं  लेती|

उसके  साथ  मैं  काफ़ी  दूर  तक  घूम  आता  था|  कुएँ  पर  पुर्वट  चल  रहा  होता  तो  वह  नाली  के  पानी  में  पैरों  से  छप-छप  करती  चलती|  बिना  बात  ही  खिलखिला  उठती  थी|  देखते  देखते  दिन,  महीने,  साल  गुज़रते  गये  और  हम  २०-२२  सालों  तक  आ  पहुँचे|

मामा  के  यहाँ  मैं  एक  माह  बाद  पहुँचा  तो  खबर  पाकर  वह  मिलने  आई|  कुछ  गंभीर  थी|  मैने  ही  पूछा- ‘शामी  क्या  बात  है?’

‘अमराई  में  चलो,  तुमसे  बात  करनी  है|’

मैं  गया|  वह  सीधे  मेरी  आँखों  में  देखती  हुई  बोली –  ‘मुझे  छू  सकते  हो?’

‘इसमें  क्या  बात  है?  अभी  छू  लेता  हूँ|’

‘नहीं  ऐसे  नहीं|  इस  पेड़  से  उस  दूर  के  पेड़  तक  दौड़  लगानी  है|  पीछे  नहीं  देखना  है|  मैं  पहले  भगूंगी,  फिर  तुम|  देखूं  मुझे  छू  सकते  हो?’

‘ठीक  है  भागो|’

वह  दौड़  पड़ी|  पीछे  मैं  था|  करीब  पहुँचने  ही  वाला  था  की  पैर  में  कुछ  चुभा|  मैं  बैठ  गया|  वह  दौड़ती  रही|  दूर  वाले  पेड़  के  पास  पहुँच  कर  वो  पलटी|

‘नहीं  छू  सके  ना?’

‘मेरे  पैर  में  कुछ  चुभ  गया  था| तुम  दौड़ने  और  छूने  की  क्या  बात  ले  बैठी|’

‘मेरी  शादी  की  बात  चल  रही |  तुम  अब  फिर  आओगे  तो  मैं  नहीं  मिलूँगी|  अगर  मुझे  छू  देते  तो  मैं  शादी  से  इनकार  कर  देती|’

‘क्यों?’

वह  थोड़ी  देर  मुझे  देखती  रही,  फिर  चुपचाप  चली  गयी|  मुझे  ‘क्यों’  का  जवाब  नहीं  मिला|

Categories: Other Languages, Stories

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