शादी

दोस्ती  बड़ी  चीज़  है,  दोस्त  के  लिए  इंसान  क्या  नहीं  करता|  दोस्त  के  लिए  तन  मन  कुर्बान  किया  जा सकता  है|  धन  की  मैं  बात  नहीं  करता|  अव्वल  तो  इसकी  अपने  पास  हमेशा  कमी  रहती  है|  दूसरे,  अगर  किसी  को  दे  दिया  तो  इसका  अता  पता  नहीं  मिलता|  मैं  थोड़ा  सलीकेदार  हूँ,  इसलिए  उसके  कई  बार  चक्कर  काटने  पर,  उसकी  पस्त  हालत  देख  कर,  उधार  लौटा  देता  हूँ|  जानता  हूँ,  की  आज  के  बाद  मुझे  तो  क्या,  किसी  को  भी  उधार  देने  की  ग़लती  नहीं  करेगा|  जीवन  में  ऐसे  ही  शिक्षा  मिलती  है|

मेरे  दोस्त  कम  हैं  पर  बेचारा  गोवर्धन  मुझे  अपना  पक्का  दोस्त  मानता  है|  उस  दिन  आया  तो घबराया  हुआ  था|  मुझसे  तीन  वर्ष  छोटा  है|

‘ख़ैरियत  तो  है?’

‘नहीं,  ख़ैरियत  नहीं  है|  मेरी  शादी  तय  होने  वाली  है| कल  लड़की  वाले  लड़की  सहित  मुझे  देखने  आ  रहे  हैं|’

‘आने  दो|  तुम  अभी  पौधा  हो|  पेड़  बन  ने  पर  क्या  होगे,  इसका  उन्हें  अंदाज़  हो  जाएगा|  तुम्हारी  उम्र 15  के  आस  पास  होगी  ना?  20-22  के  होने  तक  काफ़ी  कन्याएं  देख  लोगे,  उन्ही  में  से  एक  चुन  लेना|’

‘मज़ाक  मत  करो|  आठवी  की  परीक्षा  सिर  पर  है|  किताब  खोलता  हूँ  तो  उसमें  दो  चोटी  नज़र  आती  है|’

‘कैंची  ले  कर  कतर  दो|  एक  चोटी  कर  दो,  या  बॉब  कट  कर  दो|  तुम्हारी  मर्ज़ी  है|’

‘फिर  मज़ाक|  तुम  मेरे  दोस्त  हो|  संकट  के  समय,  दोस्त  ही  दोस्त  के  काम  आता  है|  मुझे  कोल्हू  में  बँधने  से  बचाओ|’

‘क्या  कन्या  मोटी  है?  तो  तुमने  कोल्हू  की  उपमा  क्यों  दी?  वो  परी  या  अप्सरा  भी  तो  हो  सकती  है?’

‘उसके  पिता  हुक्के  के  तंबाकू  की  दुकान  करते  हैं|  काले  काले  पिंडो  के  बीच  बैठे,  वो  भी  उन्ही  के  जैसे  लगते  हैं|  उनकी  बेटी  भी  वैसी  ही  होगी|  मेरे  चाचाजी  उनके  व्यापार  में  साझीदार  हैं,  वे  ही  मुझे  इस  झमेले  में  फसाना  चाहते  हैं|  कुछ  ऐसा  करो,  की  लड़की  देखते  ही  इनकार  कर  दे|’

मैने  गोवर्धन  की  पीठ  थपथपाई|  ‘यह  हुई  ना  बात|  ऐसा  करते  हैं,  मैं  स्टिक  से  तुम्हारी  टाँग  तोड़  देता  हूँ,  लंगड़ाते  हुए  जाना,  लड़की  फॉरन  मना  कर  देगी|  तीन  टाँग  की  शादी  भी  कोई  शादी  है?’

गोवर्धन  ने  मुझे  घूर  कर  देखा|  ‘मेरी  अच्छी  भली  टाँग  तोड़ोगे?  ये  सलाह  दे  रहे  हो?’

‘नहीं,  मैं  तो  तुम्हें  परख  रहा  था,  की  तुम  कहाँ  तक  त्याग  कर  सकते  हो|  आसान  तरकीबें  कई  हैं,  बताता  हूँ,  सुनो|’

‘अपनी  आखों  की  पुतलियों  से  अलग  अलग  दिशा  में  देखने  का  अभ्यास  कर  लो|  इसे  भैंगपन  कहते  हैं| बातें  करो  किसी  से,  देखो  किसी  और  तरफ|’

‘हक-हकलाना  शुरू  कर  दो|  जनवरी  बोलने  में,  जन  और  वरी  में  तीन  मीटर  का  फासला  कर  दो|’

‘कोई  तकिया-कलाम  बोलना  शुरू  कर  दो,  जैसे  –  आप  कैसे  हैं,  आप  के  मुँह  में ?  चाय  मँगाऊँ,  आपके  मुँह  में ?  सामने  वाला  मुँह  मोड़  भागता  नज़र  आएगा|’

‘टाँग  तोड़ने  का  शुभ  कार्य  मैं  कर  ही  देता,  पर  तुम  पीछे  हट  रहे  हो  तो  वैसे  ही  लंगड़ाना  शुरू  कर  दो |  एक  हाथ  कमर  पर  रख  लो,  जिस  से  लगे  की  भगवान  ने  तुम्हें  चार  उंगल  छोटी  टाँग  दे  कर,  इस  संसार  में  भेजा  है|’

‘तुम्हारे कान सिर्फ़ सुंदर लगें, इसलिए सिर के दोनो तरफ चिपका दिए गये हैं| ये बेचारे बहुत ऊँचा सुनते हैं| बहरे ना बन सको तो कुछ का कुछ सुनने लगना|  जैसे  अगर  वे  पूछें  की  बेटा  क्या  पढ़ते  हो ?  तो  तुम  सुनना,  स्टूल  गढ़ते  हो ?  ना  जी,  हमारे  यहाँ  फर्निचर  का  काम  नहीं  होता,  हम  क्या  कोई  बढ़ई  हैं ?’

‘हाँ,  तो  मैने  तुम्हें  काफ़ी  बता  दिया  है|  इसका  पचास  प्रतिशत  भी  याद  रहा  और  तुम  ठीक-ठाक  कर  सके  तो  विवाह  योग  की  शनि  दशा  से  बच  जाओगे|’

‘वाह  गुरुदेव,  क्या  सलाह  दी  है|  वहाँ  कोई  नहीं  होगा|  अकेले  उनका  सामना  करने  के ख्याल  से  मेरी  टाँगें  अभी  से  पयज़ामे  के  अंदर  कापने  लगी  हैं|  आप  मेरे  साथ,  मेरे  बड़े  भाई  के  रूप  में  उपस्थित  रहेंगे  तो  मुझे  सहारा  मिल  जाएगा|’

मैं  खाली  ही  था,  सो  तैयार  हो  गया|  गोवर्धन  सहमति  सुन  कर  बोला,  ‘बस  तो  मैं  चाय  नाश्ते  का  इंतेज़ांम  कर  लेता  हूँ  और  कमरा  भी  ठीक-ठाक  कर  लेता  हूँ|’

‘ना  ना  ना  ना,  ऐसा  कभी  मत  करना|  मैं  बीड़ी  के  टुकड़े  लाकर  कमरे  में  फैला  दूँगा|  अच्छा  प्रभाव  पड़ेगा|’

अगले  दिन,  हमने  लड़की  वालों  की  आवभगत  की|  लड़की  का  नाम  कदम्बी  था|  वो  अपने  पिता  जैसी  काली  बिल्कुल  नहीं  थी|  बावजूद  इसके  गोवर्धन  उसे  देखते  ही  डर  से  कापने  लगा  था|  मैने  उसके  कंधे  पर  हाथ  रख  के  उसे  दाढस  बँधाया|  गोवर्धन  ने  मेरे  बताये  सारे  गुर  तो  नहीं  अपनाए  पर  उसे  उतीर्ण  होने  लायक  अंक  दिए  जा  सकते  थे|

लड़की  वालों  ने  बड़ा  भाई  होने  के  नाते,  मुझसे  भी  काफ़ी  जवाब-तलब  किया|  गोवर्धन  तो  बच  गया,  पर  अपने  बारे  में  लड़की  वालों  को  सच-सच  बताना  कितना  महँगा  पड़ा,  ये  मुझे  बाद  में  पता  चला|  आपको  कभी  फ़ुर्सत  से  बताऊँगा|

आप  मेरे  घर  आइए  कभी|  अपने  पाँच  बच्चों  की  माँ,  कदम्बी  से  आपको  मिलाऊँगा|

Categories: Other Languages, Stories

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